Monday, December 6, 2010

पेंशन के खिलाफ छत्तीसगढ़ के किन्नर

देश की राजधानी दिल्ली के निगम ने ले ही किन्नरों के सम्मानजनक गुजारे के लिए उन्हें पेंशन देने का फैसला कर लिया है लेकिन छत्तीसगढ़ के किन्नर इस फैसले के खिलाफ हैं। किन्नरों का कहना है कि पेंशन पाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ के किन्नर सरकार द्वारा जमीन दिए जाने के बाद खुश हैं। उनका कहना है कि सरकार ने जमीन संबंधी उनकी मांग को काफी पहले ही पूरा कर दिया था।

हा ही में दिल्ली नगर निगम ने 18 साल से अधिक आयु के किन्नरों को एक हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन देने का फैसला किया है। निगम का यह मानना है कि पेंशन सुविधा का सबसे ज्यादा ला उन किन्नरों को होगा जो उम्र की ढलान पर हैं। दिल्ली नगर निगम के इस फैसले का देश के विभिन्न हिस्सों में मौजूद किन्नरों ने स्वागत किया है। लेकिन छत्तीसगढ़ के किन्नर फैसले के खिलाफ हैं। छत्तीसगढ़ किन्नर समाज की सचिव ज्योति का कहना है कि सरकारी पेंशन पाने के लिए काफी खानापूर्ति करनी पड़ती हैं। वे किन्नर जो जगह-जगह घूम-घूमकर अपनी अजीविका चलाते हैं उन्हें लाइन लगाकर पेंशन लेना गवारा नहीं होगा। छत्तीसगढ़ का कोई भी किन्नर पेंशन के लिए धक्के नहीं खाएगा। दिल्ली के किन्नरों को मिलने वाला पेंशन उन्हें मुबारक हो। ज्योति ने बताया कि सरकार ने उनके समाज को काफी पहले ही जमीन की सुविधा मुहैय्या करा दी थी। राजधानी लाभांडी के एक बेशकीमती इलाके में जमीन मिल जाने से ज्योति बेहद खुश है। ज्योति का कहना है कि रमन सरकार ने जमीन देकर किन्नर समाज की दुआएं ले ली है। किन्नर समाज की मुखिया भुल्लो नायक मानती हैं कि यदि भी गुजारे के लिए कोई समस्या खड़ी हुई तो पेंशन के बारे में सोचा जा सकता है लेकिन हाल फिलहाल छत्तीसगढ़ के किन्नर नाच गाकर बेहतर ढंग से अपनी गुजर-बसर कर रहे हैं। एक अन्य किन्नर राधिका ने कहा कि गरीबों को दिए जाने वाले पेंशन में ही बहुत सी बाधाएं खड़ी होती हैं। जिन्हें पेंशन मिलना चाहिए उन्हें पेंशन नहीं मिलता और जो पेंशन के पात्र नहीं होते उन्हें पेंशन हासिल हो जाती है। राधिका ने कहा कि उनका समाज भी भी सरकार से पेंशन की मांग नहीं करेगा। दीपावली के बाद किन्नर जगह-जगह घूम-घूमकर लोगों को दुआएं दे रहे हैं। इन दुआओं के एवज में उन्हें अच्छी खासी बख्शीश भी मिल रही हैं। छत्तीसगढ़ में यह सिलसिला पुन्नी मेले तक जारी रहेगा। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लग 400 किन्नर चिन्हित किए गए हैं। रायपुर में कुल दो दर्जन किन्नर है। ये किन्नर जिनमें राखी, सपना, कमलाबाई, विमलाबाई मनोरमा आदि शामिल हैं वे अपने रण पोषण के लिए तिल्दा, सिमगा भाटापारा, कवर्धा तक में भी घूमते हैं।

बहुरूपियों से बचने की सलाह

किन्नरों ने प्रदेशवासियों को दीपावली की शुकामनाएं दी है। समाज की सचिव ज्योति ने छत्तीसगढ़ के लोगों दयालु बताते हुए प्रदेश की चहुंमुखी तरक्की की कामना की है और कहा गरीबों को पेंशन मिल जाए यह हमारी दुआ है। किन्नरों ने लोगों को बहुरूपियों से बचने की सलाह भी दी है।

तो लीजिए अब शुरू करता हूं ब्लॉगिंग...


मेरे एक दोस्त हैं रमेश शर्मा जो सहारा में छत्तीसगढ़ के ब्यूरो हेड हैं। हम दोनों लगभग साथ शुरू हुए थे लेकिन वे दिल्ली चले गए, मैं पत्रकारिता से बाहर। छत्तीसगढ़ अंचल के राज्य बन जाने के बाद जब वो लौटे तो मुझे सीधा सहज सवाल दाग दिया क्यों छोड़ दी यार पत्रकारिता। फिर पत्रकारिता में घसीटने के लिए जोड़ लिया अपने साथ स्ट्रिंगर के तौर पर। फोटो भी खिंचवाई, लिखवाया भी।
कम्प्यूटर की थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे है, सो रमेश एक अरसे से जुटे हैं कि मैं ब्लॉग-लेखन करूं। जयप्रकाश मानस भी ने भी इससे पहले ही कहा था।
वैसे यह ज़रूर है कि मुझे समाचार और साहित्य की दुनिया के साथ जोड़ कर रखे रहने वालों में गिरीश पंकज, सुधीर शर्मा, जयप्रकाश मानस का बड़ा हाथ है। ये होते तो शायद और कहीं रोजी-रोटी की जोड़-जुगत में लगा रहता मैं और शायद इन तमाम बातों से कोई मतलब भी रखता।
बदलती परिस्थितियों में राजकुमार सोनी अपने साथ हरिभूमि ले आए और अपने साथ लगा लिया है।
तो लीजिए अब शुरू करता हूं ब्लॉगिंग...
मेरा यह भोला भाला छत्तीसगढ़ अंचल पहले मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था अब राज्य बन गया है लेकिन बदलता बहुत कुछ दिखा नहीं। स्थितियां भी पहले की तरह ही हैं। (तथ्यों की दुकान नहीं लगाऊंगा लेकिन अपनी बात जरूर कहना चाहूंगा। शायद आप कुछ तथ्य निकाल लें)
अभी हाल ही मेरे इस अंचल याने प्रदेश में एक बड़े मीडिया ग्रुप ने दस्तक दी है।
नाम ही सुन रखा था इस ग्रुप का, लेकिन जानता कुछ भी नहीं था। कई बातें चली जिनमें से एक यह थी किसी ने बताया कि पुलित्ज़र विजेता है वह। लगा, चलो अच्छा ही है। फिर एक सवाल भी दिखाई दिया कहां हैं रायपुर की आवाज़ उठाने वाले... कब तक आप शहर के ट्रैफिक में रेंगते रहेंगे। यह सवाल पहले से काम कर रहे पत्रकारों की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
बहरहाल, मेरे ख्वाबों की दुनिया सज गई कि अब इस प्रदेश में कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी। कोई जादुई छड़ी या अलादीन का चिराग लिए कोई चला रहा है कि अब पलक झपकते हो जाएंगी मेरे शहर, मेरे अंचल, मेरे प्रदेश की समस्याएं उड़न छू...!
और आखिरकार वह भी गया। एक मीठा-सा ख्वाब टूट कर बिखर गया। मेरे इस प्रदेश के हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं। सब कुछ वैसा ही है जैसा पहले था।
आने और शुरू होने के बीच कई तरह की बातें सुनाई देती रही। कोई कहता बड़ी लकीर खींच देगा तो कहीं कुछ और बात होती। लेकिन यह तो मात्र व्यापार का विस्तार साबित हुआ और किसी विशेष मीडिया समूह को सबक सिखाने और उसकी मांद में सेंध लगाने का उपक्रम।
मेरे मन में सवाल ही सवाल थे लेकिन जवाब कुछ भी नहीं। बहरहाल एक बात पूरी तरह साफ है कि चाहे जिस भी कारण से उस मीडिया ग्रुप ने इस प्रदेश में एंट्री ली हो, उसकी मंशा प्रदेश के हालात बदलना तो कतई दिखाई नहीं
इस मीडिया ग्रुप को यहां लंबा पत्रकारी इतिहास टटोलने की आवश्यकता नहीं, राज्य बनने के बाद के क्फे में अनिल पुसदकर ने दैनिक भास्कर में एक रिपोर्ट छापी थी जिस पर प्रदेश के कद्दावर कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल ने हस्तक्षेप कर सीएसईबी खेदामारा प्लांट की 20 करोड़ की संपंत्ति को मध्यप्रदेश ले जाने से बचा लिया गया था।
नेट पर लिखे गए एक लेख का जिक्र करना भी यहां मुनासिब लगता है। यह शुभ्रांशु चौधरी ने नेट पर लिखा था, शीर्षक था – The Art of Not Writing in Chhattisgarh शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है आलेख के बारे में।
अब यदि वह पत्र सादगी से आकर यहां की संस्कृति, यहां की समस्याओं से घुल-मिलकर अपनी घुसपैठ बनाता और फिर तदबीर, तकदीर और तस्वीर बदलने की बात करता तो कुछ बात भी होती।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि उस पत्र के जाने से प्रदेश में पहले से काम कर रहा मीडिया कुछ सतर्क जरूर हो गया है। अब उम्मीद बंधती है कि इस प्रदेश में नेता-अफसरों की मनमानी पर कुछ अंकुश तो लग सकेगी। मीडिया जायन्ट्स की आपसी लड़ाई के चलते प्रदेश का कुछ भला होने की भी उम्मीद दिखाई देती है।
अब आने वाले समय में मेरी कोशिश होगी कि विभिन्न विषयों पर सार्थक कुछ लिखूं