Monday, December 6, 2010

तो लीजिए अब शुरू करता हूं ब्लॉगिंग...


मेरे एक दोस्त हैं रमेश शर्मा जो सहारा में छत्तीसगढ़ के ब्यूरो हेड हैं। हम दोनों लगभग साथ शुरू हुए थे लेकिन वे दिल्ली चले गए, मैं पत्रकारिता से बाहर। छत्तीसगढ़ अंचल के राज्य बन जाने के बाद जब वो लौटे तो मुझे सीधा सहज सवाल दाग दिया क्यों छोड़ दी यार पत्रकारिता। फिर पत्रकारिता में घसीटने के लिए जोड़ लिया अपने साथ स्ट्रिंगर के तौर पर। फोटो भी खिंचवाई, लिखवाया भी।
कम्प्यूटर की थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे है, सो रमेश एक अरसे से जुटे हैं कि मैं ब्लॉग-लेखन करूं। जयप्रकाश मानस भी ने भी इससे पहले ही कहा था।
वैसे यह ज़रूर है कि मुझे समाचार और साहित्य की दुनिया के साथ जोड़ कर रखे रहने वालों में गिरीश पंकज, सुधीर शर्मा, जयप्रकाश मानस का बड़ा हाथ है। ये होते तो शायद और कहीं रोजी-रोटी की जोड़-जुगत में लगा रहता मैं और शायद इन तमाम बातों से कोई मतलब भी रखता।
बदलती परिस्थितियों में राजकुमार सोनी अपने साथ हरिभूमि ले आए और अपने साथ लगा लिया है।
तो लीजिए अब शुरू करता हूं ब्लॉगिंग...
मेरा यह भोला भाला छत्तीसगढ़ अंचल पहले मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था अब राज्य बन गया है लेकिन बदलता बहुत कुछ दिखा नहीं। स्थितियां भी पहले की तरह ही हैं। (तथ्यों की दुकान नहीं लगाऊंगा लेकिन अपनी बात जरूर कहना चाहूंगा। शायद आप कुछ तथ्य निकाल लें)
अभी हाल ही मेरे इस अंचल याने प्रदेश में एक बड़े मीडिया ग्रुप ने दस्तक दी है।
नाम ही सुन रखा था इस ग्रुप का, लेकिन जानता कुछ भी नहीं था। कई बातें चली जिनमें से एक यह थी किसी ने बताया कि पुलित्ज़र विजेता है वह। लगा, चलो अच्छा ही है। फिर एक सवाल भी दिखाई दिया कहां हैं रायपुर की आवाज़ उठाने वाले... कब तक आप शहर के ट्रैफिक में रेंगते रहेंगे। यह सवाल पहले से काम कर रहे पत्रकारों की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
बहरहाल, मेरे ख्वाबों की दुनिया सज गई कि अब इस प्रदेश में कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी। कोई जादुई छड़ी या अलादीन का चिराग लिए कोई चला रहा है कि अब पलक झपकते हो जाएंगी मेरे शहर, मेरे अंचल, मेरे प्रदेश की समस्याएं उड़न छू...!
और आखिरकार वह भी गया। एक मीठा-सा ख्वाब टूट कर बिखर गया। मेरे इस प्रदेश के हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं। सब कुछ वैसा ही है जैसा पहले था।
आने और शुरू होने के बीच कई तरह की बातें सुनाई देती रही। कोई कहता बड़ी लकीर खींच देगा तो कहीं कुछ और बात होती। लेकिन यह तो मात्र व्यापार का विस्तार साबित हुआ और किसी विशेष मीडिया समूह को सबक सिखाने और उसकी मांद में सेंध लगाने का उपक्रम।
मेरे मन में सवाल ही सवाल थे लेकिन जवाब कुछ भी नहीं। बहरहाल एक बात पूरी तरह साफ है कि चाहे जिस भी कारण से उस मीडिया ग्रुप ने इस प्रदेश में एंट्री ली हो, उसकी मंशा प्रदेश के हालात बदलना तो कतई दिखाई नहीं
इस मीडिया ग्रुप को यहां लंबा पत्रकारी इतिहास टटोलने की आवश्यकता नहीं, राज्य बनने के बाद के क्फे में अनिल पुसदकर ने दैनिक भास्कर में एक रिपोर्ट छापी थी जिस पर प्रदेश के कद्दावर कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल ने हस्तक्षेप कर सीएसईबी खेदामारा प्लांट की 20 करोड़ की संपंत्ति को मध्यप्रदेश ले जाने से बचा लिया गया था।
नेट पर लिखे गए एक लेख का जिक्र करना भी यहां मुनासिब लगता है। यह शुभ्रांशु चौधरी ने नेट पर लिखा था, शीर्षक था – The Art of Not Writing in Chhattisgarh शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है आलेख के बारे में।
अब यदि वह पत्र सादगी से आकर यहां की संस्कृति, यहां की समस्याओं से घुल-मिलकर अपनी घुसपैठ बनाता और फिर तदबीर, तकदीर और तस्वीर बदलने की बात करता तो कुछ बात भी होती।
लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि उस पत्र के जाने से प्रदेश में पहले से काम कर रहा मीडिया कुछ सतर्क जरूर हो गया है। अब उम्मीद बंधती है कि इस प्रदेश में नेता-अफसरों की मनमानी पर कुछ अंकुश तो लग सकेगी। मीडिया जायन्ट्स की आपसी लड़ाई के चलते प्रदेश का कुछ भला होने की भी उम्मीद दिखाई देती है।
अब आने वाले समय में मेरी कोशिश होगी कि विभिन्न विषयों पर सार्थक कुछ लिखूं

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