समस्याग्रस्त मांगू भैया
सुबह-सुबह
मांगू भैया का फोन। हुक्मनामा आया- जल्दी से घर आओ। आशंकाओं से घिरे मैंने पूछा-
क्या बात है भैया। इतनी...। बात-वात कुछ नहीं बस तुम आ जाओ। तुमसे एक समस्या पर
मशवरा करना है। आवाज़ में घुड़की और चिंता दोनों थी। मैंने कहा- समस्या... मैं भला
क्या सलाह... उधर बात सुने बिना फोन कट चुका था।
ये मांगू
भैया थे। छोटे काका के मित्र। हम भाई-बहन और साथी उन्हें भैया ही कहते। बेगानी
शादी में अब्दुल्ला की तर्ज़ पर देश की छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर खुद तो परेशान
रहते ही दूसरों को भी करते। गली-मोहल्ला उनके सवालों से हैरान रहता। मझोला कद। सर
सफाचट। सांवली रंगत। गोल से चेहरे पर मोटी अधपकी मूंछ। आंखों पर नए जमाने की ऐनक।
पुराने जमाने के सेठों की तरह निकली तोंद। बंडी पजामा पहनावा। सर पर गांधी टोपी। कुल
जमा उनका यह रूप और पहनावा उन्हें चिंतक का रूप प्रदान करता। फोन आया तो जाना भी
ज़रूरी था।
शहर से कुछ
दूर उनका ठिकाना। बाहर से पुरानी हवेली फिल्म जैसा उनका घर। आधुनिक सुविधाओं से
लैस। मेरे पहुंचते ही चाय-नाश्ते लाने की आज्ञा प्रसारित हुई। अब दो घंटे से पहले
छूटने वाला नहीं। वे बड़ी समस्या में हैं यह समझ गया। करता भी क्या... उन्हें टाल
भी तो नहीं सकता था। चुपचाप अभिवादन किया। उनके सामने बैठ गया बलि के बकरे की
भांति। खुशामदी मुस्कान के साथ बोले- आ गए। कैसे हो। मैंने मसोस कर कहा- ठीक हूं
भैया। पर आप ये क्या सुबह-सुबह बुला भेजा।
मांगू भैया
ने बिना मेरी फिक्र किए कहना शुरू किया- देखो, तुम पत्रकार टाइप आदमी हो सो मुझे लगा देश की इतनी बड़ी समस्या पर तुमसे ही
बात करना ठीक रहेगा। संकोच भाव से मैंने कहा- क्या भैया आप भी... वे बोले- समस्या
पर बात करूं या औपचारिकता का खेल खेलें...
मैंने सवाल
किया- आखिर समस्या क्या है भैया...
उसी पर आ
रहा हूं। माथे पर सलवट के साथ उनकी चिंता बाहर आना शुरू हुई। बात आगे बढ़ाई- देखो
भाई,
65 सालों के
देश के इतिहास में पहली बार कांग्रेस से इतर किसी पार्टी की स्पष्ट बहुमत वाली
सरकार बनी है। मैंने कहा- यह बात तो है...
शांत भाव से
उन्होंने कहा- पहले मेरी पूरी समस्या तो सुन लो फिर अपनी पत्रकारिता की बुहारी
मारना। बोले- तो पहली बार ऐसी सरकार बनी है जो कांग्रेसविहीन सरकार है। लेकिन मेरी
चिंता यह है कि सरकार के दो साल बाद भी समस्याएं वैसी ही हैं जैसी पहले हुआ करती
थी।
मैंने बीच
में पूछ लिया- क्यों भइया ऐसी क्या समस्या दिखाई दे रही है आपको... मांगू भैया
गुस्साए- अरे तुम पहले समस्या तो सुन लो फिर जो कहना होगा कहना। तो सुनो, पहले महंगाई डायन थी आज विकास है। पहले भी
कब्जे होते थे पर ऐसे नहीं कि दो घंटे के लिए धरना-प्रदर्शन के नाम पर मिली जगह पर
कब्जा ही कर डालो। न केवल कब्जा करो, वहां लोगों को बसाओ,
हथियार, असलहा-बारूद जमा करो और फिर सरकार को चुनौती
दो। उनके चेहरे पर चिंता के भाव मक्खी की तरह भिनभिनाने लगे।
भइया, आप तो जामबाग वाले कामवृक्ष की बात कर रहे हैं।
वह तो मानसिक बीमार बताया जाता है। बरसों पहले किसी गुरुदेव के साथ नौटंकी किया
था। अब वह अपने को सुभाष चंद्र बोस का अवतार मानता है।
हां, हां उसी की बात कर रहा हूं। देखो इतना सब
होता रहा और सरकार को भनक भी न हुई। सरकार के आंख-कान-नाक सब जुकामग्रस्त थे क्या।
किसी ने इसे संज्ञान में नहीं लिया। उल्टे सालों पुराने इस मामले में हर जिम्मेदार
अफसर ने मामले को पोसा-पाला। मांगू भैया ने एक ही सांस में इतना सब कह डाला। अब
हांफने लग गए।
मैंने कहा-
हां भैया। यह समस्या तो है। वे बोले-
भैया पहली
बात शिकायत के बिना सरकार कार्रवाई नहीं कर सकती और न ही संज्ञान लेती है। जब तक
दो-चार न मरें,
मौतों पर
हंगामा न हो सरकार को कुछ दिखाई नहीं देता। वह कामी कामवृक्ष खुले आम कब्जा कर रहा
था तो शिकायत करने की हिमाकत आखिर करता कौन। अब वे रौ में आ चुके थे- यही यदि गरीब
की झोंपड़ी हो या व्यापार बड़े नेताओं को छोड़ो प्रशासनिक अधिकारी संज्ञान ले कर
हरकत में आ जाते हैं और उन्हें नेस्तनाबूद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यहां वह
कामी कर रहा था तो इसमें किसी बड़े नेता या लॉबी का संरक्षण नहीं रहा होगा भला।
ऐसी हालत में प्रशासन सोता रहे यह भी कोई बात हुईा। वे थोड़ा रुके। मेरी ओर
निहारा। मेरी आंखों में प्रशंसा के भाव देख कर फिर बोले- अब कुछ बोलो न। बोलने की
जगह पर बोलते नहीं और अब क्या हुआ तुम्हारी ज़ुबान को।
मुझे कहना
पड़ा- भैया आप ठीक बोल रहे हैं संज्ञान तो लेना चाहिए था शासन-प्रशासन को। ऐसे में
ही तो फिर न्यायालय को दखल देना पड़ता है सरकारी कामकाज में।
प्रसन्न
मांगू भैया ने कहा- हां,
अब कही न
तुमने मौके की बात। लेकिन यहां भी तो एक पेंच है, वह यह कि जनता के नुमाइंदों को यह बात नागवार गुजरती है। कहते हैं कि कोर्ट
सरकार के काम में दखलंदाजी करे। देखो न केंद्र के एक मंत्री ने बयान ठोक ही दिया
कि कार्यपालिका का काम न्यायपालिका न करे।
मैंने कहा-
हां भैया...
वे अपनी
हाकंने में लगे हुए थे- हां ये नेता अपने ऊपर अंकुश क्यों भला चाहेंगे चाहे वे कुछ
भी करें। बहुत से मामलों में अभी तक कोई निर्णय नहीं हो सका है- जैसे जनलोकपाल को
ही लो। अन्ना हजारे ने जब पिछली सरकार के समय लोकपाल की बात छेड़ी तब तो आज के सत्तारूढ़ लोगों ने उन्हें भारी समर्थन दिया
और आज जब वे सत्ता में काबिज हैं तो उनके कामकाज (भ्रष्टाचार के) को रोकने के लिए
ऐसे किसी लोकपाल को यूं ही सर पर बिठाएंगे क्या।
मैंने
उन्हें याद दिलाया- भैया हम कामवृक्ष वाले मामले में बात कर रहे थे। वे क्रोधित हुए। बोले- देखो तुम भी सरकार की तरह ही
बात कर रहे हो। मुद्दे से भटकाने का काम कर रहे हो। मैं भटका नहीं हूं। मैं कहना
चाहता हूं कि सरकार को ऐसे मामलों में सख्ती बरतना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह
निरंकुश लोगों को पनपने ही न दे... लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है। वह खुद तो
निरंकुश रहना चाहती है और दूसरों पर अंकुश चाहती है। सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों
पर कार्रवाई करे,
उनको गोली
मार दे... ऐसे ही अपराधियों पर नियंत्रण हो सकेगा... सरकार हाय-हाय, सरकार मुर्दाबाद...
वे अब आपे
से बाहर हो गए थे। अब उन्हें रोकना कठिन लगने लगा। चिंतन में उनकी आंखें बंद हो
चुकी थी। कल्पना में ही वे जंतर-मंतर तक पहुंच चुके थे और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन
रैली में शामिल थे। यही मौका था मेरे लिए वहां से खिसकने का। चाय का इंतज़ार किए
बिना ही वहां से निकल लिया। नहीं तो न जाने कितनी देर और उन्हें झेलना पड़ता।
