Sunday, June 26, 2016

व्यंग्य

रसूख का व्यापार

मेरे मित्र के एक मित्र हैं फिरतू। रहते गांव में हैं लेकिन खबर पूरे शहर की रखते हैं।

मेरे मित्र ने उनकी बड़ी तारीफ कर रखी थी सो मैं उनसे मिलने के लिए उनके गांव चला गया। पहले कभी मिला नहीं था सो मैंने फिरतू को अपने मित्र के मित्र के रूप में अपना परिचय दिया। वह एकदम चहक उठा। उसने कहा- तहूं पत्रकार हस। मैंने जवाब दिया नहीं तो। मैं तो उनका मित्र हूं बस। मेरा एक छोटा सा व्यापार है।

वाह। फिरतू ने खुश होते हुए कहा- तैं बेपारी हस त एक ठन बेपार हम ल सुरु करे बर हे। बने होइस आप मन आ गेएव। हम ल आइ़़डिया देवव। काम ल कइसे कर के सुरू करे जाए। मैं सकपकाया, कंप्यूटर का काम करने वाला छोटा सा दुकानदार यह जाने किस व्यापार की बात करे। फिर भी अपने शहरी होने के दंभ में मैंने हामी भर दी।

फिरतू बताने लगा- देख भाई खेती बाड़ी म अब कुछु नई रह गे हे फेर बेपार छोटे होही तभो ले रोजी रोटी चल जही। मैं जेन बेपार ह के बात करत हों ओ एकदम छोट अकन हे। हम ल एक ठन जघा चाहिए। मेरा सवाल- क्या करने का विचार है आपका। फिरतू भड़क गया। उसने कहा- टोका टाकी झन कर तैं पहिली पूरा बात ल सुन ले समझ ले फेर कुछु बोलबे। मैं सहमा। चुप रह गया। फिरतु आगे बढ़ा- भइया हम ल एक ठन कांप्लेक्स खड़ा करे बर हे। मैंने हुंकारी भरी। उसने कहा- हम ल एक ठन सरकारी नजूल जमीन चाही। एकर उप्पर एक शर्त हे जमीन ह तरिया किनारे या नदी किनारे होही त बढ़िया। मैंने कहा- सरकारी जमीन पर तो रसूखदार लोग ही कब्जा कर सकते हैं। उसने चट जवाब दिया- एकरे कारण तो तोला कहत हन। हम गांव-गंवई के रहइया हन। हम ल जमीन के पता लगाय म टाइम भी लगही अउ पइसा घलो जाही। आप मन सहर के रहइया हो। सब चतुराइ अउ आदमी मन ल जानत होहु। मैं हैरान रह गया उसके इस अंदाजे पर। मित्र ने बताया ही था कि फिरतू से बच के रहना वह बहुत सी जानकारी रखता है। शहर में किसने कहां कब्जा किया किसने क्या गोटी फिट की और कहां जा बैठा। उसे इस बात का बखूबी अंदाजा था कि शहर में रहने वाला है तो हमारे काम आ सकता है।

फिरतू के एक ही डपट से मैं घबराया हुआ था, सो धीरे से कहा- भाई मैं कोई चतुराई नहीं जानता। आम आदमी हूं। और सरकारी लोगों से तो दूर ही रहता हूं, जाने कब किस बात के पैसे मांग लें और न ही नेताओं से मेरी कोई पहचान है। वह नहीं माना। बोला- फोक्कट फालतू बात झन कर तैं। सहर म रहत हस त हम गांव वाला मन ल एकदमेच गंवार समझत हस का ? मैं अब बुरी तरह घबरा गया था। जाने फिरतू और क्या कहे सो बात को आगे बढ़ाया। बोला- चलो ठीक है फिरतू मैं तुम्हारा काम करने की कोशिश करूंगा। आगे तो बताओ...।

फिरतू हंसा। बोलने लगा- अब आएस न लाइन म। सोझ बात करत हों त तैं मोला झंगलू झंटू झन समझ। हां त मोर पिलान हे के जमीन कम से कम दू एकड़ होना चाही अउ जादा हो सकत हे तो पांच एकड़ तक चल जाही। मैंने सवाल दागा- जमीन का मान लो हो गया तो आगे का क्या, क्या होगा व्यापार और कैसे होगी कमाई। फिरतू मेरी नादानी पर खल टाइप की हंसी के साथ आगे बढ़ा- कुछु नहीं गा। पहिली हमन उहां एक ठन भव्य मंदिर बनाबो। ओकर बर एक ठन नेता के तरीका ल अपनाबो। मेरा सवाल- क्या ? एक ठन ट्र्स्ट बना लेबो अउ मंदिर चारों तरफ दुकानेच दुकान बना देबो अउ ओला बेच के हमू करोड़पति बन जाबो।

मैंने कहा- ये सब रसूख वालों का काम है हम तुम यह सब नहीं कर सकते। उसने तपाक से कहा- इहीच तो कारन हे के मैं आप मन ल बोलत हों। उसकी बात की काट नहीं मिलने पर मैंने पूछा- किसी ने कोर्ट में केस कर दिया तो...

उसने झट कहा- कोरट के डिसीजन होवत त हमन नेतागिरी करे लग जाबो। फेर जब फैसला आही तब तक त हमन सेटिंग करके कोई बढ़िया जगह म पहुंच जाबो। फेर हमर कोई कुछु नहीं बिगाड़ पाही।

मैंने कहा- फिर भी...

आगे उसने तुरुप का पत्ता रखते हुए कहा- देख भाई सबो जानत हें के नदी के एपार बन गे हे। हमन नदी के ओप्पार बनाबो। ओ इलाका ह दूसर जिला म हो जाही त हमन ल कब्जा करे म आसानी हो जाही न गा। ए पार लफड़ा चलत हे हमन ओपार बनाबो।


फिरतू की बात सुन कर मेरे दिल की धड़कन बढ़ने गई और मुझे लगा कि अब ज्यादा देर रुका तो अपनी लायजनिंग का काम वह मुझसे करवा कर ही दम लेगा। मैंने तुरंत अपनी मोटर सायकल स्टार्ट की और वहां से भाग खड़ा हुआ।

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