सरकारी योजना
फिरतू मुझे शहर से बाहर के रास्ते पर मिल गया।
मैं शहर की ओर आ रहा था। वह गांव की ओर लौट रहा था। मैं उससे बचने की फिराक में
था। वह मुझे छोडने को तैयार न था। उसने अपनी 96 मॉडल लूना मेरी बाईक के सामने अड़ा
दी। कहा- गांव से आए के बाद तुमन दिखेच्च नइ गा। मैं झेपा। बहाना बनाया। बोला- काम
बहुत...
जुन्ना बात ल छोड़ बहाना झन बना। मेरी बात काट
दी। उसने कहा- तैं नइ आएस, फेर हमर जमीन के काम बन गिस। ए दरी मोर चिंता दूसर हे।
मैंने राहत की सांस ली। सोचा बच गए। मेरा प्रश्न- अब किस चिंता में पड़ गए फिरतू
तुम ! उसकी मुख मुद्रा
गंभीर हुई। कहने लगा- पैदा होए से ले के मनखे के मरत तक के सबो काम ल अब सरकार करत
हे।
मैंने कहा- अच्छी तो बात है। कल्याणकारी सरकार
है। अब तो बस जीने का काम ही आदमी का रह गया है। उसने मुझे घूर कर देखा। कच्चा चबा
जाने वाली निगाहों से। मैंने और कुछ कहने की हिम्मत नहीं की। यहीच्च तो चिंता के
बात हो गे हे। चिंतित फिरतू ने कहा। अइसनेच्च म तो आदमी काम धाम करे बर बंद कर
देवत हे। ओती खेती-किसानी बर मजदूर के अकाल हो गे हे। एक तरफ मौसम के मार अऊ दूसर
तरफ मजदूर के दिक्कत। एकर उप्पर करेला म नीम चघ गे हे किसान के करजा।
उसकी बात में वजन था। मैंने कहा- बात तो तुमने
पते की कही फिरतू। एक तरफ आदमी कामचोर बन रहा और दूसरी तरफ किसानों के किसानी काम
के लिए मजदूर नहीं मिल रहे तो शहरों में भी काम करने के लिए कामगार नहीं मिल रहे।
सरकार की कल्याणकारी योजना अकल्याणकारी बन रही है।
फिरतू की चिंता अब चिंतन में बदल गई। बोला-
यहीच्च तो चिंता के बात हे। फेर सरकार जनता के कल्याण बर जतका स्कीम चलावत हे ओ ह
मनखे बर जंजाल बनत जात हे। फेर ये सब के ठेका बेपारी मन ले दे जाथे। सरकार के अइसन
काम से बेपारी के पौबारा होवत हे अउ बाकी सब ठन ठन गोपाल। बेपारी मन जतका काम करैं
नइ ओकर से डबल भ्रष्टाचार करथें। सरकारी बाबू-अफसर मन संग सांठगांठ करके पइसा घलो
खाथें अउ घटिया सामान के सप्लाई करथें। यही चलन हो गे हे। उसका चिंतन जारी था। यह
देख मैंने बीच में बोलने की हिम्मत नहीं की,
एकर उप्पर जिनिस के भाव आसमान म जात हे। करजा म बूड़त जात हे का किसान, का
आम आदमी। सबके हाल एके बरोबर हो गे हे। मैंने सहमति में केवल हुंकारी दी।
बातों का रूख मोड़ते हुए मैंने कहा- अब देखो न
फिरतू, सरकार ने बच्चों की सेहत के लिए पौष्टिक दूध देने की योजना बनाई और उसे पी
कर दो बच्चों की जान चली गई और कई बच्चे गंभीर हो गए।
फोक्कट फालतू बीच म झन बोले कर तैं। फिरतू ने
डपटते हुए कहा। मैंने डर कर फिर से चुप्पी कायम कर दी। व्यवधान पर वह नाराज़ हुआ।
बोलने के लिए मेरे मुंह से बोल ही नहीं फूटे। जवाब में उसने कहा- सरकार डेयरी खोले
के काम ल कर दिस। अब उत्पादन करइया अउ सप्लाई करइया मन का करत हें तेला सरकार कइसे
जान सकत हे ! इतना कहते फिरतू के
गाल उत्तेजना से लाल हो गए। उसके नथुने फूल गए। शरीर से पसीना निकलने लगा।
तो तुम्हारा मतलब है, दूध बनाने वाले या देने
वाले की कारस्तानी है ? मैंने पूछ लिया।
अपनी रौ में फिरतू ने उत्तर में कहा- अउ नइ तो
का ? देख भई ठाकुर, सरकार अपन काम ल कर दिस रोजगार के बेवस्था करे बर। ठीक। अब ओकर
सप्लाई करे बर तो एजेंट बनाए गे हे न। एजेंट के भी कारस्तानी हो सकत हे न।
मैं हतप्रभ था फिरतू की सोच पर। बोला- बात समझ
में नहीं आई फिरतू। ज़रा खुल कर बोलो।
का तैं सहर के रहइया हस भाई। अतेक छोटे बात तोला
नइ समझ म आत हे। मेरी बुद्धि पर तरस खाते हुए फिरतू ने कहा। उसने समझाया- देख
सरकार ह एजेंट बनाए हे न। मैंने हामी भरी। वह बोला- येदे एजेंट, आंगनबाड़ी
कार्यकर्ता अउ अफसर मन के सांठगांठ से ए कारस्तानी हो सकत हे के नई ए लापरवाही ह।
भ्रष्टाचार कारस्तानी दूसर के अउ बदनाम होइस सरकार। वहू फोक्कट फालतू।
मैं कुछ कह न सका। चुप ही रहा। मेरी चुप्पी देख
उसने आगे कहा- सरकार कइसे जान डारही सबके सांठगांठ ला। बिना शिकायत अउ दुर्घटना के
सरकार कइसे संज्ञान ले लिही। भगवान सब जान सकत हे, फेर सरकार भगवान तो नई हे न।
चुप्पी ओढ़े मैंने आगे बढ़ जाने में ही अपनी
भलाई समझी और पतली गली से
निकल लिया।

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